हकलाहट की समस्या कब पैदा होती है ।
यह कहना मुश्किल है कि हकलाहट की समस्या कब पैदा होती है । चूकीं हकलाहट की समस्या कोई बीमारी नहीं है । यह समस्या डर और भय की मिलाजुली परिस्थिति में पैदा होती है । जब कोई व्यक्ति कोई बात करते वक़्त हकलाने लगता है तो उसकी बात को सुनने वाला शख़्स उसकी बातों की तरफ़ ध्यान ना देते हूए उसके हकलाने के कारण उस पर हँसने लगता है । उसकी यह हँसी हकलाने वाले को उसकी बेइज़्ज़ती का अहसास करवाती है जो की उस व्यक्ति के डर का कारण बन जाती है । यही डर उस व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या यानि हकलाहट का कारण बन जाती है ।
भविष्य में जब भी कभी उस व्यक्ति यह डर सताएगा तब उसे हकलाहट की समस्या का सामना करना पड़ेगा ।
हकलाहट की समस्या पर काबू पाना और एक जगंली घोड़े को अपने वश में करना दोनों एक समान है। कहने का तात्पर्य यह है कि एक जगंली घोड़े को अपने वश में करने के लिये यां उस पर नियंत्रण करने के लिये समय लगता है। और एक बार इसको अपने वश में कर लेने के बाद वह आपके नियंत्रण में आ जाता है। फिर ज़रूरत होती है उस नियंत्रण को बरकरार रखने की ताकि वह फिर से आपके नियंत्रण के बाहर ना हो जाए। इसके लिए आपको समय – समय ध्यान रखना पड़ता है।
हकलाहट की समस्या भी कुछ इसी प्रकार है। कुछ विशेष प्रकार के व्यायाम और उचित देख-रेख से यह समस्या काफी हद तक नियंत्रण में आ जाती है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह समस्या भविष्य में सदा के लिये समाप्त हो गई है। कुछ ख़ास कारण जैसे चितिंत रहने , अत्यधिक क्रोधित होने यां समय – समय पर हकलाहट के प्रति जागरूक ना होने से यह समस्या फिर उभर कर सामने आ जाती है।