हकलाहट की समस्या को कैसे क़ाबू में किया जाए ।

हकलाहट की समस्या को कैसे क़ाबू में किया जाए ।

हकलाहट की समस्या को क़ाबू में करने के लिए सबसे पहले उस व्यक्ति में यह पता लगाना होता है की उसकी हकलाहट की समस्या हकलाहट की कौन सी क़िस्म से संबंधित है । जो कि इस बात पर निर्भर करती है कि यह शुरू कैसे हुई यां हकलाहट के शुरू होने के पीछे क्या कारण था।

अपने कई वर्षों के अनुभव से मैं हकलाहट की समस्या को मैं मुख्यता 2 किस्मों में बाँटता हूँ।

1 हकलाहट की पहली मुख्य किस्म को मैं  जन्मजात हकलाहट का नाम देता हूँ । जो कि आमतौर पर हमें देखने को मिलती है।

१ इस तरह कि हकलाहट 4 से 8 वर्ष की आयु में शुरू होती है।

२ इस तरह की हकलाहट से ग्रस्त बच्चे का दिमाग काफ़ी तेज़ होता है।

३ पहले शब्द में समस्या ज्यादातर इस श्रेणी  में पाई जाती है।

४ यह अकसर तेज बोलते हैं।

५ बच्चे स्वभाविक तौर पर शर्मीले होते हैं   

६ उनका सोचने का मादा यानी आई क्यू लेवल काफी ऊंचा होता है। पढ़ाई में सबसे आगे होते हैं। आदि

2 नकल करने से हकलाहट की समस्या का होना।

इस तरह की हकलाहट की समस्या उन लोगों में पाई जाती है जो किसी हकलाहट से ग्रस्त व्यक्ति की नक़ल करते हैं। यह पहले तो बिलकुल ठीक बोलते हैं पर जब किसी हकलाहट से ग्रस्त व्यक्ति की नक़ल ज़्यादा देर तक करते हैं। तब उन्हें भी यह समस्या शुरू हो जाती है। इसके मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं।

१ यह समस्या किसी भी आयु में शुरू हो सकती है।

२ इस समस्या से ग्रस्त व्यक्ति डरा हुआ महसूस करता है।

३ यह समाज से अलग थलग रहने की कोशिश करता रहता है।

५ बोलते समय अचानक ही रुक जाता है।

आदि

हकलाहट की क़िस्म का पता लगाने के बाद उस समस्या को क़ाबू में करने संबंधित कार्य करने चाहिए । जो की निम्नलिखित हैं ।

जन्मजात हकलाहट की समस्या को क़ाबू करने के लिए

१ हकलाहट की समस्या को क़ाबू में करने के लिए व्यक्ति का सकारात्मक सोच का होना ज़रूरी है ।

२ हकलाहट की समस्या से संबंधित व्यक्ति को हर रोज़ सुबह के समय श्वास से संबंधित व्यायाम करने चाहीए ।

३ संबंधी व्यक्ति को किताबें बोल-बोल कर पढ़नी चाहीए । इन किताबों को धीमी गति और ऊँची आवाज़ में पढ़ना चाहिए ।

४ ख़ाली समय में कोई ना कोई गीत गुनगुनाने से इस समस्या पर काफ़ी हद तक क़ाबू में किया जा सकता है ।

५  अगर किसी शब्द को बोलने में कठिनाई हो रही है तो ख़ाली समय में उस शब्द को बार बार बोलने का प्रयास करें ।

६ सदैव ख़ुश और तनावमुक्त रहने की कोशिश करें क्योंकि यह समस्या उदासी और तनाव की स्थिती में ज़्यादा उभर कर सामने आती है ।

नक़ल करने के कारण हूई हकलाहट की समस्या को क़ाबू करने के लिए

किसी हकलाहट की समस्या से पीड़ित व्यक्ति की नक़ल करने के कारण उस व्यक्ति में पैदा हूई हकलाहट की समस्या को क़ाबू करना जन्मजात हकलाहट की समस्या की अपेक्षा थोड़ा कठीन होता है । क्योंकि इस प्रकार की समस्या से पीड़ित व्यक्ति को पहले तो ख़ुद को ही पता नहीं होता की वह किसी नक़ल करते हूए ख़ुद इस समस्या का शिकार हो गया है और जब तक उसे इस बात का पता चलता है तब तक बहूत देर हो जाती है ।

नक़ल करने से पैदा हूई हकलाहट की समस्या को क़ाबू में करना ज़रा मुश्किल होता है क्योंकि इस प्रकार से पैदा हूई समस्या में पीड़ित व्यक्ति अपना आत्मविश्वास खो देता है और किसी से बात करने से डरने लगता है । उसका यह डर और आत्मविश्वास की कमी उसकी हकलाहट की समस्या को और बढ़ा देती है । इस प्रकार की समस्या से पीड़ित व्यक्ति सहमा सहमा सा रहता है । इसका कारण यह है की पहले ते उस व्यक्ति को खुद को ही पता नहीं होता की वह हकलाने की नक़ल करते हूए ख़ुद इस समस्या का शिकार हो गया है । चूकीं उसके मुताबिक़ वह सही बोल सकता है और उसे हकलाहट जैसी कोई समस्या नहीं है परन्तु जब वह कभी बोलते समय रुक जाता है यां यूँ कह लें की हकलाने लगता है तो वह अपनी इस परिस्थिति पर हैरान परेशान हो जाता है । इससे उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है ।

अपनी इस समस्या से निजात पाने के लिए सबसे पहले उसे अपने खोए हूए आत्मविश्वास को वापिस पाना होता है । इसके लिए संबंधीत व्यक्ति को किसी अजनबी जगह में जाकर अजनबीयों से बातचीत करना चाहीए । यानि इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति को किसी ऐसे शहर , गाँव या क़स्बे में जाकर वहाँ के दुकानदारों से ख़रीदोफरोत करने के बहाने उनसे बातचीत करनी चाहीए । इससे यह होगा कि अगर कहीं वह व्यक्ति उन दुकानदारों से बातचीत करते समस्या रुक जाता है यां हकलाने लग जाता है तो उसे अपनी हकलाहट की समस्या को कारण हूई बेइज़्ज़ती की चितां नहीं होगी और ना उसे किसी बात का डर होगा क्योंकी वह दुकानदार जिनके सामने वह हकला रहा है वह कौन सा उसे जानते हैं और ना ही कभी भविष्य में उनसे मुलाक़ात होनी है ।

इस प्रकार संबंधीत व्यक्ति का डर समाप्त हो जाता है और धीरे-धीरे उसका खोया हुआ आत्मविश्वास भी लौट आता है । परंतु हकलाहट की समस्या को काबू में करना और एक जगंली

घोड़े को अपने वश मे करना दोनों एक समान है। यह काम मुश्किल ज़रूर है परन्तु नामुमकिन नहीं । जिस प्रकार घोड़े को अपने वश में करने के लिये  समय , धैर्य और विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार हकलाहट पर काबू पाने के लिये इन तीनों चीजों की आवश्यकता होती है।

हकलाहट की समस्या को क़ाबू में करने के लिये समय की आवश्यकता होती है। यह आप के उपर निर्भर करता है की आप कितना समय  हकलाहट की समस्या पर काबू पाने के लिये खर्च करते हैं। अगर इस बात को एक उदाहरण के द्वारा बताया जाए तो यह ऐसा है जैसे आपने नया – नया साइकिल को चलाना सीखना हो। इसकी समय सीमा इस बात पर निर्भर करती है कि आप जितनी रूचि और ईमानदारी साइकिल को चलाना सीखने में दिखाते हैं उतनी ही जल्दी आप साइकिल चलाना सीख जाते हैं।

इसके लिए आपको धैर्य रखने कि आवश्यकता होती है कई बार हकलाहट को काबू पाने के लिये किये गए आपके प्रयास में समय अधिक लग जाता है। और आप इससे ऊब कर यां निराश होकर अपने प्रयास को बीच में ही छोड़ देते हैं। जो कि भविष्य में आपके द्वारा कि गई एक गलती साबित होती है ।

हकलाहट पर काबू पाने के लिये विशेष प्रकार के प्रशिक्षण कि आवश्यकता होती है। जिसके लिए आपको विशेष तौर पर प्रशिक्षित व्यक्तियों  यां स्पिच थैरेपि से जुड़े डाक्टरों कि आवश्यकता होती है। कुछ लोग जिनका मनोरथ सिर्फ धन कमाना होता है। वह आपको  बेतुकी सी दवाएं और बे-ढगीं और बिना किसी अर्थ की तकनीक से आपकी हकलाहट की समस्या को हल करने का दावा करते हैं। जिससे निश्चित ही आपको कोई लाभ प्राप्त नहीं होता और आपका इस सब से विश्वास उठ जाता है । अतं में आप हकलाहट को एक लाइलाज बीमारी समझ कर इस पर भविष्य में नियंत्रण करने के लिये कोई भी प्रयास नहीं करते।

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